

बलौदाबाज़ार :
जिले में अस्पतालों पर भरोसा किया जाता है—लेकिन ओमकार हॉस्पिटल पर भरोसा करना अब डरावनी फिल्म देखने जैसा हो गया है।
पहले से दो बड़े मामले जांच के दायरे में और ऊपर से ताज़ा कांड ऐसा कि पूरा शहर दंग!
सीन-1 : सड़क हादसा… और एंबुलेंस ड्राइवर की “डायरेक्ट एंट्री” ओमकार हॉस्पिटल में
08 दिसंबर की शाम ग्राम बरपाली के पास एक सड़क हादसा हुआ। ग्रामीणों ने एंबुलेंस बुलाई, उम्मीद थी कि घायल सीधे जिला अस्पताल जाएंगे…
पर एंबुलेंस ड्राइवर तो जैसे किसी “सीक्रेट मिशन” पर था—
👉 परिजन चीखते रहे : “सरकारी अस्पताल ले चलो!”
👉 ड्राइवर अड़ा रहा : “नहीं! ओमकार ही जाएंगे!”
न पुलिस सूचना… न कानूनी प्रक्रिया… बस सीधे ओमकार हॉस्पिटल की ओर रफ़्तार!
जैसे एंबुलेंस नहीं, हॉस्पिटल की प्राइवेट डिलीवरी वैन हो!
सीन-2 : अस्पताल में स्याह अंधेरा—परिजनों से खाली पन्नों पर जबरन साइन!
हॉस्पिटल पहुंचते ही माहौल बदल गया।
दरवाज़े बंद, जानकारी बंद, मरीजों की स्थिति बंद… और
👉 “इलाज शुरू करने हैं… जल्दी साइन करो!”
खाली फॉर्म पर जबरदस्ती हस्ताक्षर—क्या इलाज था या कोई कॉन्ट्रैक्ट?
रात 10 बजे एक युवक की मौत… और उसे तुरंत जिला अस्पताल भेज दिया गया।
लेकिन दो अन्य युवक—तरुण और रितेश—अस्पताल के “कम्पाउंड” में ही गायब!
सीन-3 : डॉक्टरों की “रेट लिस्ट”—इलाज नहीं, ठेका!
परिजनों ने जब पूछा—“बच्चे कहाँ हैं?”
जवाब नहीं…
लेकिन अस्पताल ने अपनी “रेेट लिस्ट” ज़रूर बता दी—
💰 तरुण – 4,00,000 रुपये
💰 रितेश – 1,50,000 रुपये
डॉक्टर राबिया और डॉक्टर वसीम रज़ा का एंगल कहता है—
“इलाज चाहिए तो ठेका ले… वरना मरीज नहीं मिलेगा!”
परिजन बोले—“सरकारी अस्पताल ले जाएंगे!”
हॉस्पिटल बोला—
👉 “मरीज नहीं देंगे… पहले पैसा दो!”
सीन-4 : फर्जी पत्रकार ऋषि शुक्ला की धमाकेदार एंट्री
अस्पताल ने अपनी नई ‘कास्ट’ को बुलाया—
कथित फर्जी पत्रकार और स्वयंभू संयोजक ऋषि शुक्ला।
उसने आते ही बैकग्राउंड म्यूजिक बदल दिया—
👉 “बिना पैसा… कोई मरीज नहीं मिलेगा।
यहीं इलाज कराओ… नहीं तो और दिक्कत होगी!”
इसके बाद रितेश के नाम पर 10,000,
तरुण के नाम पर 25,000 लिए गए…
और बदले में मिली सिर्फ कच्ची रसीदें—जैसे सड़क किनारे पकोड़े खरीद लिए हों!
अगले दिन फिर डिमांड—
3 लाख और दो… वरना मरीज नहीं मिलेगा!
दो दिनों से परिजन अपने ही बच्चों से मिलने तक नहीं पाए।
इलाज की जगह मानसिक प्रताड़ना—
हॉस्पिटल इलाज नहीं, हॉस्टेज ड्रामा चला रहा था!
सीन-5 : परिजनों की गुहार—“कलेक्टर साहब! हमारे बच्चों को आज़ाद कराइए”
राधेलाल पटेल ने कलेक्टर को लिखित शिकायत दी और सीधे कहा—
👉 मरीजों को हॉस्पिटल की “कैद” से छुड़ाया जाए
👉 एंबुलेंस ड्राइवर, डॉक्टरों और फर्जी पत्रकार पर FIR हो
👉 मृतक युवक के केस की भी निष्पक्ष जांच हो
यह सिर्फ एक हादसा नहीं… जिले की पूरी स्वास्थ्य प्रणाली पर सवाल है।
ओमकार हॉस्पिटल पर पहले भी 2 गंभीर जांचें लंबित होने के बावजूद कोई कार्रवाई न होना प्रशासन की कार्यशैली पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
सीन-6 : जिले की जनता का सवाल—कब जागेगा प्रशासन?
परिजनों का कहना—
“अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला पूरे जिले की स्वास्थ्य सुरक्षा का काला धब्बा बन जाएगा।”
ओमकार हॉस्पिटल ने फिर दिखा दिया—
जहां मरीजों की जान दांव पर हो…
वहाँ लालच और दबाव का खेल खुलेआम चलता है।





